8- 12 जुलाई, 2026, नाशिक
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस
रंगभूमि
सृजन और संवर्धन (पांच दिवसीय आवासीय) कार्यशाला
उत्प्रेक: मंजुल भारद्वाज
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8- 12 जुलाई, 2026, नाशिक
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस
रंगभूमि
सृजन और संवर्धन (पांच दिवसीय आवासीय) कार्यशाला
उत्प्रेक: मंजुल भारद्वाज
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रंगभूमि: विचार,विवेक,चैतन्य और सौंदर्य बोध की भूमि!
- मंजुल भारद्वाज
कितना सुंदर शब्द है रंगभूमि! ऐसी भूमि जहां रंग अंकुरित होते हों, पनपते हों, खिल उठते हों अपने सौंदर्य बोध के साथ।
रंगभूमि में निहित शब्द रंग का अर्थ कितनो को मालूम है?
आम समझ है कि रंग मतलब रंगीला,मौज मस्ती, टाइम पास, मनोरंजन, भोग....
यह आम समझ किसने बनाई?
यह समझ बनाई और आज भी बना रही है सत्ता । सामाजिक, धार्मिक,आर्थिक,सांस्कृतिक और राजनैतिक सत्ता ।
सबसे बड़ी त्रासदी यह कि सत्ता ऐसे भांड पैदा करती है जो रंगभूमि को भोग यानी मनोरंजन समझे,वही प्रसारित करे और उसके लिए नुमाइश करे, प्रसिद्ध हो जाए, फिल्म, सीरियल करे और आम जनता में सत्ता की रची परिभाषा को पुनः पुनः स्थापित करते रहें कि रंगभूमि 'भोग यानी मनोरंजन' है!
सत्ता और भांडों की 'भोग यानी मनोरंजन' की आम समझ को चुनौती दी "थियेटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन ने और लगातार 34 वर्षों से दे रहा है और देता रहेगा।
"थियेटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन ने रंगभूमि में निहित रंग की व्याख्या की है, रंग यानी विचार और रंगभूमि का अर्थ है रंगों की भूमि ! रंगभूमि मतलब विचार,विवेक,चैतन्य और सौंदर्य बोध की भूमि!
सत्ता रंग यानी विचार को भोग यानी मनोरंजन क्यों बताती है? और रंगभूमि को माध्यम भर क्यों मानती है? भोग यानी मनोरंजन क्यों पालती है? भोग यानी मनोरंजन वाली समझ वाले भांड क्यों प्रशिक्षित करती है अपने ड्रामा स्कूलों और अकादमियों में? सत्ता नाटक के नाम पर भोग यानी मनोरंजन वाले नुमाइशों के मज़में क्यों लगाती है?
उत्तर बहुत साफ़ है रंगभूमि अपनी कोख में विद्रोह पालती है! रंगभूमि पर विचार जन्मते हैं। प्रश्न उठते हैं। चेतना जागती है! परिवर्तन का आगाज़ होता है वो भी बिना खून खराबे के !
रंगभूमि विद्रोह है और विद्रोह से सामाजिक,धार्मिक,आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक सत्ता डरती हैं । इसलिए वो रंगभूमि के विद्रोह को दफ़न कर उसे भोग और मनोरंजन की साज़िश रचती हैं,रच रही हैं और रचती रहेंगी ! क्योंकि सत्ता को सवाल पसंद नहीं , विद्रोह पसंद नहीं । इसलिए वो ऐसे भांड पैदा कर रही है जो भोग और मनोरंजन को प्रचारित, प्रसारित और स्थापित करें!
"थियेटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन रंगकर्मियों की ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहा है जो रंगभूमि को भोग और मनोरंजन नहीं विचार, विवेक, चैतन्य और सौंदर्य बोध की भूमि समझें और जिएं!
कितनी सुंदर है रंगभूमि, जो प्रकृति सम सृजन करती है। प्रकृति के मूल्यों को मनुष्य में संजोती है। प्रकृति विविध है तो रंगभूमि विविधता के सौंदर्य बोध को सजा मनुष्य को इंसान बनाती है। संवेदना तो प्राणियों में भी हैं, पर मनुष्य में विचार करने की क्षमता है और रंगभूमि विचारों का उपवन है जहां विविध रंग अंकुरित होते हैं,पनपते हैं, खिलते हैं और दुनिया को मानवीय और सुंदर बनाते हैं।
आओ रंगभूमि के मूल और उसकी समग्रता को प्रकृति के सानिध्य में आत्मसात करें। मानसून आ गया है प्रकृति अपने रंगों से सज नई सृजन साधना कर रही है। आओ हम प्रकृति के साथ सृजन कर रंगभूमि को समृद्ध करें।
"थियेटर ऑफ़ रेलेवंस" ने इसलिए 8 से 12 जुलाई,2026, पांच दिन की ' रंगभूमि: सृजन एवम् संवर्धन ' आवासीय कार्यशाला का आयोजन किया है। इस कार्यशाला में सभी सहभागी एक साथ रहेंगे और नाशिक के पास अंजनेरी पर्वतमाला में प्रकृति की सृजन प्रक्रिया को आत्मसात कर रंगभूमि की मूल और समग्र दृष्टि को आत्मसात करेंगे!
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस
रंगभूमि
सृजन और संवर्धन (पांच दिवसीय आवासीय) कार्यशाला
8- 12 जुलाई, 2026, नाशिक
उत्प्रेक: मंजुल भारद्वाज
अनुभव एवं प्रक्रिया
कभी बादलों को
पहाड़ों का
आलिंगन करते देखा है
कैसे लिपटकर बह निकलते हैं
झर झर करते हुए....
कभी पहाड़ों को
बादलों को ओढ़ते हुए देखा है
बादलों में छिपकर
पहाड़ों को स्नान करते
देखा है कभी ....
प्रकृति पंचतत्वों से
कैसे सृजन करती है
देखा है कभी ....
आओ प्रकृति से
सीखें सृजन पक्रिया
और
रंगभूमि को संवर्धित करें!
- मंजुल भारद्वाज
छवियां रंगभूमि सृजन और संवर्धन कार्यशाला की !
रंगभूमि को कृत्रिम बना दिया गया है इस जड़ता को तोड़ते हुए, प्राकृतिक मंच पर रंग और भूमि को आत्मसात करते हुए कलाकार!
रंग का अर्थ है विचार! विचारों की भूमि है रंगभूमि! प्रकृति से सम होते हुए अपने सृजनकार को साधते कला साधक जहां पंचतत्व आकार और निराकार की सिद्धि साधते हैं!
कहां होता है ऐसा रंग प्रशिक्षण.... रंगभूमि के साथियों मनन करिए!
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस रंगभूमि: सृजन और संवर्धन (पांच दिवसीय आवासीय) कार्यशाला
8- 12 जुलाई, 2026, नाशिक उत्प्रेक: मंजुल भारद्वाज
सृजन शोध!
छवियां रंगभूमि सृजन और संवर्धन कार्यशाला की !
रंगभूमि को कृत्रिम बना दिया गया है इस जड़ता को तोड़ते हुए, प्राकृतिक मंच पर रंग और भूमि को आत्मसात करते हुए कलाकार!
रंग का अर्थ है विचार! विचारों की भूमि है रंगभूमि! प्रकृति से सम होते हुए अपने सृजनकार को साधते कला साधक जहां पंचतत्व आकार और निराकार की सिद्धि साधते हैं!
कहां होता है ऐसा रंग प्रशिक्षण.... रंगभूमि के साथियों मनन करिए!
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थियेटर ऑफ़ रेलेवंस
रंगभूमि: सृजन और संवर्धन (पांच दिवसीय आवासीय) कार्यशाला
8- 12 जुलाई, 2026, नाशिक उत्प्रेक: मंजुल भारद्वाज
चैतन्य अभ्यास!
Breaking the shackles! अपनी बेड़ियों को तोड़ते हुए!
छवियां रंगभूमि सृजन और संवर्धन कार्यशाला की !
रंगभूमि को कृत्रिम बना दिया गया है इस जड़ता को तोड़ते हुए, प्राकृतिक मंच पर रंग और भूमि को आत्मसात करते हुए कलाकार!
रंग का अर्थ है विचार! विचारों की भूमि है रंगभूमि! प्रकृति से सम होते हुए अपने सृजनकार को साधते कला साधक जहां पंचतत्व आकार और निराकार की सिद्धि साधते हैं!
कहां होता है ऐसा रंग प्रशिक्षण.... रंगभूमि के साथियों मनन करिए!
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रंगभूमि सृजन और संवर्धन कार्यशाला की !
पंचतत्वों से रंगभूमि के अनिवार्य तत्वों को साधते हुए ! रंगभूमि को कृत्रिम बना दिया गया है इस जड़ता को तोड़ते हुए, प्राकृतिक मंच पर रंग और भूमि को आत्मसात करते हुए कलाकार!
रंग का अर्थ है विचार! विचारों की भूमि है रंगभूमि! प्रकृति से सम होते हुए अपने सृजनकार को साधते कला साधक जहां पंचतत्व आकार और निराकार की सिद्धि साधते हैं!
कहां होता है ऐसा रंग प्रशिक्षण.... रंगभूमि के साथियों मनन करिए!
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थियेटर ऑफ़ रेलेवंस
रंगभूमि: सृजन और संवर्धन (पांच दिवसीय आवासीय) कार्यशाला
8- 12 जुलाई, 2026, नाशिक
उत्प्रेक: मंजुल भारद्वाज
छवियां रंगभूमि सृजन और संवर्धन कार्यशाला की ! रंगभूमि को कृत्रिम बना दिया गया है इस जड़ता को तोड़ते हुए, प्राकृतिक मंच पर रंग और भूमि को आत्मसात करते हुए कलाकार! रंग का अर्थ है विचार! विचारों की भूमि है रंगभूमि! प्रकृति से सम होते हुए अपने सृजनकार को साधते कला साधक जहां पंचतत्व आकार और निराकार की सिद्धि साधते हैं! कहां होता है ऐसा रंग प्रशिक्षण.... रंगभूमि के साथियों मनन करिए!
रंगभूमि जब सृजित और संवर्धित होती है
तब सुर और स्वर गाते हैं
खूबसूरत है ज़िंदगी..
रंगभूमि: विचार,विवेक,चैतन्य और सौंदर्य बोध की भूमि!
- मंजुल भारद्वाज
कितना सुंदर शब्द है रंगभूमि! ऐसी भूमि जहां रंग अंकुरित होते हों, पनपते हों, खिल उठते हों अपने सौंदर्य बोध के साथ।
रंगभूमि में निहित शब्द रंग का अर्थ कितनो को मालूम है?
आम समझ है कि रंग मतलब रंगीला,मौज मस्ती, टाइम पास, मनोरंजन, भोग....
यह आम समझ किसने बनाई?
यह समझ बनाई और आज भी बना रही है सत्ता । सामाजिक, धार्मिक,आर्थिक,सांस्कृतिक और राजनैतिक सत्ता ।
सबसे बड़ी त्रासदी यह कि सत्ता ऐसे भांड पैदा करती है जो रंगभूमि को भोग यानी मनोरंजन समझे,वही प्रसारित करे और उसके लिए नुमाइश करे, प्रसिद्ध हो जाए, फिल्म, सीरियल करे और आम जनता में सत्ता की रची परिभाषा को पुनः पुनः स्थापित करते रहें कि रंगभूमि 'भोग यानी मनोरंजन' है!
सत्ता एक रंग को पसंद करती है। वो सबको एक रंग में डालना चाहती है। प्रकृति बहुरंगी है। यही प्रकृति और सत्ता का द्वंद्व है। प्रकृति बहुरंग यानी विविध है और सत्ता एक रंग ! प्रकृति विविधता की विधाता है और रंगभूमि प्रकृति की विविधता को सहजने की कलात्मक साधना!
रंगभूमि बहुरंगी यानी विविध है। रंगों का गुलदस्ता है। जो दर्शक समाज की चेतना को विविध रंगों से जोड़ती है। विविध रंगों की समावेशकता की भूमि का दर्शकों की चेतना में आलोकित करती है। और यही सत्ता को नहीं चाहिए। सत्ता को चाहिए एक रंग की दबदबा।
पर दुनिया में आज तो सत्ता को एक रंग भी नहीं चाहिए । क्योंकि उन्होंने दुनिया को इतना बदरंग कर दिया है कि रंगों को पहचाने की क्षमता दुनिया ने खो दी है। चारों ओर बदरंग बदरंग का बोलबाला है। रंग का अर्थ है विचार और बदरंग का मतलब है विकार!
विचार आत्मबल से सृजित होता है। विचार दुनिया को कल्याण पथ दिखाता है। विकार आत्महीनता से पनपता है और दुनिया का विनाश करता है। आज सत्ता रंग नहीं दुनिया को बदरंग कर रही है। विकारी सत्ता दुनिया पर काबिज़ है। इसलिए मनुष्य खरीद फ़रोख्त की वस्तु बन गया है। दुनिया में युद्ध से त्राहिमाम है। हिंसा चरम पर है और मानवीय मूल्य धराशाई।
सत्ता रंगभूमि के रंगों को बदरंग बनाने के लिए उसकी चेतना को भोथरा बना उसके सौंदर्य बोध को भोग में बदल रही है। इसी षड्यंत्र को वो भोग यानी मनोरंजन कहती और कहलवाती है।
सत्ता का अर्थ समझिए, सत्ता का अर्थ है वो प्रवृति जो अपने को श्रेष्ठ समझती है, जिसका मूल भाव आधिपत्य है। और जिसका लक्ष्य श्रेष्ठता सिद्ध करना । इसका एक उदाहरण समझिए।
मनुष्यों के द्वारा माना जाता है कि शेर जंगल का राजा है। क्या शेर को खाने की कोई कमी होती है? पर मनुष्य की सत्ता प्रवृति शेर को अपने कब्ज़े में करना चाहती है। और वो शेर का शिकार कैसे करती है? जिस शेर को खाने की कोई कमी नहीं होती सत्ता प्रवृति उसे खाने का लालच देती है। सहज खाना उपलब्ध कराने का लालच! किसी जानवर को बांध देती है और शेर उसे खाने आता है और मनुष्य की सत्ता प्रवृति के जाल में फंस जाता है।
मनुष्य प्रजाति सत्ता प्रवृति के इस कर्म को बहादुरी मानती है कि उसने शेर को कब्ज़े में ले लिया। और कब्ज़ा करने की प्रवृति सब मनुष्यों में पनपने लगती है। पनपती है।
शेर दो वजह से शिकार हुआ । पहला भूख यानी पेट और दूसरा सहज यानी कृत्रिम भोजन की उपलब्धता! पूरे जंगल में शेर को भोजन उपलब्ध होता है पर उसके लिए उसे प्राकृतिक संघर्ष करना होता है दूसरे प्राणियों के साथ क्योंकि मारना कौन चाहता है? जान सबको प्यारी है। पर सत्ता प्रवृति शेर को सहज भोजन उपलब्ध कराती है जो शेर की प्रकृति के विरुद्ध है। प्रकृति के विरुद्ध कर्म आपका विनाश कर देता है। शेर का भी वही हुआ वो मनुष्य की सत्ता प्रवृति का गुलाम हो गया ।
सत्ता प्रवृति शेर को गुलाम बनाने तक सीमित नहीं रही उसने मनुष्यों को गुलाम बनाया । दासता, सामंतवाद से लेकर आज तक वो मनुष्यों को गुलाम बनाए हुए है। वजह वही दो 1. भूख 2. उसे मिटाने का वादा। दुनिया में अच्छे दिन आयेंगे से सत्ता बनती है और चलती है। पर क्या अच्छे दिन आए?
पेट के बल सारी दुनिया रेंग रही है। पेट भरने को जीवन का सत्य मान रही है। सत्ता उसे यही बताती है शिक्षा,संस्कार और संस्कृति से । सत्ता ऐसे कवियों, लेखकों को आगे बढ़ाती है जो शेर के शिकार को सत्ता का शौर्य बताते हैं। मनुष्य की हिंसक प्रवृति को भगवान बनाकर पूजते हैं। युद्ध करने वालों को अवतार बताते हैं। कालांतर में यह हिंसक अवतार पूजे जाते हैं। इनकी हिंसा को धर्म युद्ध बताया जाता है। सत्ता की हिंसा का गुणगान करने वाले , हिंसा को भक्ति को चोला चढ़ाने वाले लेखक,कवि नहीं होते वो मनुष्यता के शत्रु होते हैं।
सत्ता प्रवृति यानी किसी भी तरह के आधिपत्य के खिलाफ़ विद्रोह है रंगभूमि। रंगभूमि प्रकृति की प्रक्रियाओं को मनुष्य की प्रकृति से जोड़ती है। उसकी आधिपत्य प्रवृति पर प्रहार करती है। इसलिए सत्ता उसके विद्रोह को दबाने के लिए षड्यंत्र रचती है और लगातार रच रही है। सत्ता के आधिपत्य यानी हिंसा को अवतारी बताने वाले कवियों, भांडों को भक्ति रस में डुबाकर आस्था मनुष्यता को गटर में पहुंचा रही है। रंगभूमि को भोग यानी मनोरंजन बता रही है।
सत्ता और भांडों की 'भोग यानी मनोरंजन' की आम समझ को चुनौती दी "थियेटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन ने और लगातार 34 वर्षों से दे रहा है और देता रहेगा।
"थियेटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन ने रंगभूमि में निहित रंग की व्याख्या की है, रंग यानी विचार और रंगभूमि का अर्थ है रंगों की भूमि ! रंगभूमि मतलब विचार,विवेक,चैतन्य और सौंदर्य बोध की भूमि!
सत्ता रंग यानी विचार को भोग यानी मनोरंजन क्यों बताती है? और रंगभूमि को माध्यम भर क्यों मानती है? भोग यानी मनोरंजन क्यों पालती है? भोग यानी मनोरंजन वाली समझ वाले भांड क्यों प्रशिक्षित करती है अपने ड्रामा स्कूलों और अकादमियों में? सत्ता नाटक के नाम पर भोग यानी मनोरंजन वाले नुमाइशों के मज़में क्यों लगाती है?
उत्तर बहुत साफ़ है रंगभूमि अपनी कोख में विद्रोह पालती है! रंगभूमि पर विचार जन्मते हैं। प्रश्न उठते हैं। चेतना जागती है! परिवर्तन का आगाज़ होता है वो भी बिना खून खराबे के !
रंगभूमि विद्रोह है और विद्रोह से सामाजिक,धार्मिक,आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक सत्ता डरती हैं । इसलिए वो रंगभूमि के विद्रोह को दफ़न कर उसे भोग और मनोरंजन की साज़िश रचती हैं,रच रही हैं और रचती रहेंगी ! क्योंकि सत्ता को सवाल पसंद नहीं , विद्रोह पसंद नहीं । इसलिए वो ऐसे भांड पैदा कर रही है जो भोग और मनोरंजन को प्रचारित, प्रसारित और स्थापित करें!
"थियेटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन रंगकर्मियों की ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहा है जो रंगभूमि को भोग और मनोरंजन नहीं विचार, विवेक, चैतन्य और सौंदर्य बोध की भूमि समझें और जिएं!
कितनी सुंदर है रंगभूमि, जो प्रकृति सम सृजन करती है। प्रकृति के मूल्यों को मनुष्य में संजोती है। प्रकृति विविध है तो रंगभूमि विविधता के सौंदर्य बोध को सजा मनुष्य को इंसान बनाती है। संवेदना तो प्राणियों में भी हैं, पर मनुष्य में विचार करने की क्षमता है और रंगभूमि विचारों का उपवन है जहां विविध रंग अंकुरित होते हैं,पनपते हैं, खिलते हैं और दुनिया को मानवीय और सुंदर बनाते हैं।
आओ रंगभूमि के मूल और उसकी समग्रता को प्रकृति के सानिध्य में आत्मसात करें। कला के दो बिंदु होते है जो उसे कला बनाते हैं। एक चैतन्य और दूसरा सौंदर्य बोध । यह दोनों बिंदु जब मिलते हैं तब कला सृजित होती है । रंगभूमि इन दोनों बिंदुओं की सृजन भूमि है जो जीवित कलाकारों और दर्शकों के समागम को सृजन क्षितिज में स्थापित कर इंसानियत को आलोकित करती है।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन रंगभूमि की इसी साधना के लिए प्रतिबद्ध है। इसी क्रम में अपनी प्रस्तुतियों से एक दर्शक समाज का पूरी दुनिया में निर्माण कर रही है जो सत्ता के बदरंग को पहचान मनुष्यता और इंसानी रंगों को पहचान दुनिया को बेहतर और मानवीय बना सके!
प्रकृति अपने रंगों से सज नई सृजन साधना कर रही है। आओ हम प्रकृति के साथ सृजन कर रंगभूमि को समृद्ध करें।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस: रंगभूमि सृजन एवम् संवर्धन कार्यशाला
प्रक्रिया अनुभूति! - मंजुल भारद्वाज
चारों ओर तबाही का मंज़र। डूबते महानगर,टूटते पुल, डूबता हाईवे, दरकते पहाड़, नदी बनती सड़कें... भयावह मंज़र!
विकास में अंधी सत्ता और समाज अपने पंचतत्वों से युद्धरत हैं! परिणाम प्रकृति अपने अस्तित्व पर कोई भी कब्ज़ा बर्दाश्त नहीं करती और मनुष्य के आधिपत्य को खारिज़ कर देती है। और इस युद्ध में बलि चढ़ रही है विकास में अंधी जनता !
मानसून ने शुरुआत में ही अपना विकराल रूप अख़्तियार किया । बिल्कुल इंस्टेंट तरीके से ,झटपट फ़टाफ़ट, ताबड़तोड़... नतीजा यत्र तत्र सर्वत्र पानी .. पानी और भय ...
मनुष्य के आधिपत्य,एकाधिकार, लालच और पूरी पृथ्वी, प्रकृति को संचालित करने की लालसा ने विनाश की प्रवृति को जन्म दिया है। आधिपत्य और श्रेष्ठता की कामना ने मनुष्य को विकारों से भर दिया है... प्रकृति उसे बार बार चेता रही है....
इस भय व्याप्त वातावरण में सहभागियों का एक समूह निकलता है रंगभूमि को आत्मसात करने के लिए!
कार्यशाला के स्थल क्षेत्र में सत्ता द्वारा बादल फटने की भविष्यवाणी का सतर्कता पूर्वक विश्लेषण कर, सार्वजनिक भय को अपने ध्येय की प्रतिबद्धता से चीरते हुई सहभागियों का समूह पहुंचा कार्यशाला स्थल पर !
मुम्बई,नाशिक,मालेगांव से आए सहभागी अपने अपने क्षेत्र के टूटे पुलों, बंद सड़कों को छोड़ नए रास्तों को खोजते हुए कार्यशाला स्थल पर पहुंचे।
अंजनेरी पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा हुआ यह आदिवासी क्षेत्र बहुत ही रमणीय है। आज यहां आदिवासियों की ज़मीन को लीज पर लेकर प्रकृति के सौंदर्य पर अधिकार करने की मनुष्य चेष्टा ज़ोरों पर है। आदिवासियों के घर चारों ओर बन रहे रिजॉर्ट की वजह से अब महानगरों की झोपड़पट्टी जैसे नज़र आने लगे हैं और आने वाले समय में विकास का बुलडोजर इन्हें ज़मीदोज़ कर देगा !
बारिश ने बहुत आत्मीयता से पहाड़ों को स्नान कर तृप्त कर दिया । सूर्य के ताप में किसी तपस्वी की तरह तपते पहाड़ बरसात से शीतल हो ... अपने आगोश से शुद्ध जल के झरनों को प्रवाहित कर रहे हैं... झर झर करते यह सफ़ेद झरने बड़ी रफ़्तार से प्यासी भूमि की प्यास बुझा वैतरणा झील में समा रहे हैं... वही वैतरणा झील जो आदिवासियों की ज़मीन को घेरे हुए है और मुम्बई की प्यास बुझाती है! ज़मीन आदिवासियों को , पानी आदिवासियों का .. अधिकार मुम्बई का !
इस प्राकृतिक सौंदर्य बोध ने सहभागियों के भय को रोमांच में बदल दिया । सहभागी प्रकृति के तत्वों का स्पर्श करने को बेताब थे .. सबसे पहले उन्होंने ताज़ा शुद्ध जल से प्रवाहित झरने को स्पर्श किया । अपने भय को इसमें बहा दिया । एक सुकून और निर्मल भाव सहभागियों में जागृत हुआ ।
प्राणियों के पंच तत्वों में पानी एक तत्व है। झरने के प्रवाह ने सहभागियों के भावानिक प्रवाह को उत्प्रेरित किया। उसके बाद सहभागियों ने इस अनुभूति को रंगमंचीय प्रस्तुति में बदल दिया । इस प्रस्तुति प्रक्रिया ने सहभागियों को रंगभूमि सृजन और संवर्धन से जोड़ दिया ।
रात में बिना बिजली के झर झर करते झरनों की आवेगात्मक
लोरियों ने सहभागियों को एक सृजन क्षितिज में स्थापित कर दिया । महानगरीय रात के हादसों से दूर एक सुकून भरी,प्राकृतिक संगीत और स्वर के आगोश में बीती रात ने सहभागी को तरोताज़ा कर दिया।
दूसरे दिन की सुबह उत्साह,फुर्ती और प्रकृति को अपने अंदर समा लेने के भाव से झरनों के साथ साथ चलते हुए... धीरे धीरे उसमें समा गए और झरने धरती को छोड़ सहभागियों में बहने लगे !
सहभागियों के भीतर बहते झरने उनके अंदर रंगभूमि को अंकुरित करने लगे। झरनों के बाद सहभागियों ने पहाड़ को नापना शुरू किया। पहाड़ पर चढ़ते हुए अपने शरीर, फेफड़ों,पांव के जोड़ , शरीर क्षमता को मापते हुए पहाड़ की चोटी पर एक पठार पर पहुंचे! एक ऐसे शिखर पर पहुंचे जहां वो 360 डिग्री व्यू के साथ खुला था । अपने आप को 360 डिग्री देखने की यह अदभुत अनुभूति सहभागियों को एक चैतन्य क्षितिज पर ले गए । ऊपर से दुनिया को देखने से समझ आया कि हम कहां घिरे हुए हैं। जो आकार इतने बड़े लगते हैं वो कितने छोटे हैं। इस 360 डिग्री व्यू ने सहभागियों को प्रकृति के विभिन्न रंगों से रूबरू कराया ।
हरा,पीला,लाल,काला,नीला, सफ़ेद.... आदि अंकुरित होते हुए रंग ... पूरी धरती पर उगते हुए यह रंग उसको रंगभूमि में परिवर्तित कर रहे थे...
इस सृजन प्रक्रिया ने सहभागियों को रंगों के अर्थ चैतन्य से जोड़ा। हर रंग का एक विचार है। हर रंग की भूमि है। रंगों की भूमि है रंगभूमि! रंगभूमि का मूल अर्थ और ध्येय को सहभागियों ने प्रकृति के सानिध्य में आत्मसात किया।
रंगभूमि की इस मूल अवधारणा को आत्मसात करते हुए सहभागियों ने प्रस्थापित रंगभूमि की कृत्रिम , सत्ता जनित समझ, मान्यताओं को तोड़ना शुरू किया ।
रंगभूमि सृजन भूमि है जहां विचारों को मथकर विकारों से मुक्त होने की दृष्टि चेतना सृजित होती है। रंगभूमि विचारों की विविधता को सहेजती है।
सहभागियों ने प्रकृति के रंगों और सौंदर्य बोध को अपनी कलात्मक रंग प्रस्तुति के रूप में सृजित कर रंगभूमि की मूल दृष्टि को आत्मसात किया ।
संकीर्णता व्यापकता में,स्वार्थ स्व अर्थ में, भय भरोसे और युक्ति में, परम्परा प्रगतिशीलता में, प्रगतिशीलता परिवर्तन में,कृत्रिमता प्राकृतिक अनुभूति और अभिव्यक्ति में बदलता रहा .... विचार अंकुरित होते रहे .. दृष्टि कलात्मक स्पंदन कलात्मक आकार लेकर निराकार होते रहे ....
आत्म अध्ययन अध्यात्म क्षितिज में पैठता रहा जहां रंगभूमि सृजित और संवर्धित होती रही ....
बहते झरने, बादलों का पहाड़ों से आलिंगन, पहाड़ों का बादलों की चादर में छुप जाना, धरती पर अंकुरित होते रंग ... अलग अलग वनस्पति का आकार लिए हुए... हवा के तेज़ झोंकों से स्पंदित होता प्रवाह रंगकर्मियों की रंगभूमि सृजन साधना को ब्रह्माण्ड से जोड़ता रहा ...
चैतन्य और सौंदर्य बोध के अनिवार्य कलात्मक बिंदुओं को साधते हुए सभी सहभागी अपने नव रंग आत्म चैतन्य को साध अपने गंतव्य पर लौट गए .. रंगभूमि सृजन और चैतन्य का संकल्प लिए!
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन विगत 34 वर्षों से रंगभूमि के मूल अर्थ और ध्येय के समर्पित है। रंगभूमि के मूल ध्येय को सत्ता बदरंग करती आई है और करती रहेगी ... थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन सत्ता के षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दशकों को रंगभूमि के मूल ध्येय और अर्थ से रूबरू कराता रहेगा !
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थियेटर ऑफ़ रेलेवंस
रंगभूमि
सृजन और संवर्धन (पांच दिवसीय आवासीय) कार्यशाला
8- 12 जुलाई, 2026, नाशिक
उत्प्रेक: मंजुल भारद्वाज
रंगभूमि: सृजन और संवर्धन कार्यशाला
प्रसंग 1.
सुबह सुबह अपने शरीर को टटोलते,उत्साह से भरपूर पहाड़ी के शिखर को छुने के लिए सहभागी एक एक ढग भर रहे थे । पहाड़ बादलों की चादर में लिपटा हुआ ...
हवा के झोंके बीच बीच में पहाड़ का घूंघट उठा रहे थे। चारों ओर रोमांच पसरा हुआ था ...
अपने घुटनों के जोड़ों, फिसलते कदमों को संभालते हुए, सांसों की बढ़ती रफ़्तार दिल की धड़कन बढ़ा रही थी ... धोकनी को तरह चलती सांसे लिए सहभागी पहाड़ के पठार पर पहुंचे...
ढलान से उभरते सर ... चमकती आँखें, रोमांचित मन और हासिल करने का भाव ... इस पल सबकी निरीक्षण शक्ति चरम पर थी,आलोकित थी, प्रकृति का रोयां रोयां देख रहे थे , कैसे भूमि से नए और विविध रंग अंकुरित हो रहे थे....
सब सहभागियों ने एक साथ ज़मीन से उगे छोटे छोटे पौधों को देखा, धरती से तीन इंच ऊपर अपने विविध रंगों वाली यह वनस्पति हवा की बाहों में झूल रही थी ....
उस वनस्पति को देख कर सभी सहभागी हवा को बाहों में वनस्पति की तरह झूलने लगे... वनस्पति, प्रकृति और मनुष्यों का यह अद्भुत एकाकार ... एकरूप, एक स्वरूप .. कलात्मकता का यह सृजन पल अविस्मरणीय... अद्भुत...
- मंजुल भारद्वाज
थियेटर ऑफ रेलेवंस : रंगभूमी सृजन आणि संवर्धन कार्यशाळा
प्रक्रिया अनुभूती! – मंजुल भारद्वाज
चहुबाजूंनी विनाशाचे चित्र. बुडणारी महानगरे, कोसळणारे पूल, पाण्याखाली जाणारे महामार्ग, खचणारे डोंगर, नद्यांचे रूप धारण करणारे रस्ते... भयावह दृश्य!
विकासाच्या आंधळ्या ध्यासाने पछाडलेली सत्ता आणि समाज आपल्या पंचतत्त्वांशीच युद्ध करत आहेत! परिणामतः, प्रकृती आपल्या अस्तित्वावर कोणतेही अतिक्रमण सहन करत नाही आणि मनुष्याच्या आधिपत्याला नाकारते. या युद्धात बळी पडत आहे विकासाच्या आंधळेपणात गुरफटलेली जनता!
मान्सूनने सुरुवातीलाच आपले विक्राळ रूप धारण केले. अगदी इन्स्टंट पद्धतीने, झटपट, भराभर, ताबडतोब... परिणाम यत्र तत्र सर्वत्र पाणी... पाणी... आणि भय...
मनुष्याचे आधिपत्य, एकाधिकार, लालसा आणि संपूर्ण पृथ्वी, प्रकृतीला नियंत्रित करण्याची आकांक्षा यांनी विनाशाची प्रवृत्ती जन्माला घातली आहे. आधिपत्य आणि श्रेष्ठत्वाच्या इच्छेने मनुष्याला विकारांनी व्यापून टाकले आहे... प्रकृती त्याला वारंवार सावध करत आहे...
या भयग्रस्त वातावरणात रंगभूमीला आत्मसात करण्यासाठी सहभागींचा एक समूह मार्गस्थ होतो!
कार्यशाळेच्या परिसरात सत्तेकडून वर्तविण्यात आलेल्या ढगफुटीच्या इशाऱ्याचे सजगपणे विश्लेषण करून, सार्वजनिक भीतीला आपल्या ध्येयनिष्ठेने भेदत सहभागींचा समूह कार्यशाळेच्या स्थळी पोहोचला.
मुंबई, नाशिक, मालेगाव येथून आलेले सहभागी आपल्या-आपल्या भागातील कोसळलेले पूल, बंद रस्ते मागे सोडून नवे मार्ग शोधत कार्यशाळास्थळी पोहोचले.
अंजनेरी पर्वतरांगेच्या कुशीत वसलेला हा आदिवासी प्रदेश अत्यंत रमणीय आहे. आज येथे आदिवासींच्या जमिनी भाडेपट्ट्याने घेऊन प्रकृतीच्या सौंदर्यावर अधिकार मिळविण्याचा मनुष्याचा प्रयत्न वेगाने सुरू आहे. आदिवासींच्या घरांच्या चहूबाजूंनी उभे राहणारे रिसॉर्ट्स त्यांच्या वस्त्यांना आता महानगरातील झोपडपट्ट्यांसारखे भासवू लागले आहेत आणि येणाऱ्या काळात विकासाचा बुलडोझर त्यांनाही जमिनदोस्त करेल!
पावसाने अत्यंत आत्मीयतेने पर्वतांना स्नान घालून तृप्त केले. सूर्याच्या तापात एखाद्या तपस्व्यासारखे तळपलेले डोंगर पावसाने शीतल होऊन आपल्या कुशीतून शुद्ध जलाचे झरे प्रवाहित करत होते... झरझर वाहणारे हे शुभ्र झरे प्रचंड वेगाने तहानलेल्या भूमीची तहान भागवत वैतरणा तलावात विलीन होत होते... तोच वैतरणा तलाव, ज्याने आदिवासींच्या जमिनींना वेढले आहे आणि मुंबईची तहान भागवत आहे! जमीन आदिवासींची, पाणी आदिवासींचे... अधिकार मात्र मुंबईचा!
या नैसर्गिक सौंदर्यबोधाने सहभागींची भीती रोमांचात परिवर्तित केली. सहभागी प्रकृतीच्या तत्त्वांना स्पर्श करण्यासाठी आतुर झाले. सर्वप्रथम त्यांनी ताज्या, निर्मळ जलाने प्रवाहित होणाऱ्या झऱ्याला स्पर्श केला. आपल्या भीतीला त्या प्रवाहात वाहून दिले. सहभागींच्या अंतरंगात एक शांतता आणि निर्मळ भाव जागृत झाला.
प्राणिमात्रांच्या पंचतत्त्वांमध्ये पाणी हे एक तत्त्व आहे. झऱ्याच्या प्रवाहाने सहभागींच्या भावनिक प्रवाहाला प्रेरित केले. त्यानंतर सहभागीांनी या अनुभूतीचे रंगमंचीय प्रस्तुतीत रूपांतर केले. या प्रस्तुती प्रक्रियेमुळे सहभागी रंगभूमी सृजन आणि संवर्धनाशी जोडले गेले.
रात्री विजेशिवाय झरझर वाहणाऱ्या झऱ्यांच्या आवेगपूर्ण अंगाईगीतांनी सहभागींची स्थापना एका सृजनशील क्षितिजावर केली. महानगरीय रात्रीतील कल्लोळा पासून दूर, नैसर्गिक संगीत आणि स्वरांच्या कुशीत व्यतीत झालेल्या त्या रात्रीने सहभागी ताजेतवाने झाले.
दुसऱ्या दिवसाची सकाळ उत्साह, चपळता आणि प्रकृतीला स्वतःमध्ये सामावून घेण्याच्या भावनेने उजाडली. झऱ्यांच्या सोबत चालता चालता सहभागी हळूहळू त्यात विलीन झाले आणि झरे जणू धरती सोडून सहभागींच्याच अंतरंगात वाहू लागले!
सहभागींच्या अंतरंगात वाहणारे हे झरे त्यांच्या आत रंगभूमीचे अंकुर फुलवू लागले. झऱ्यांनंतर सहभागींनी पर्वत मोजण्यास सुरुवात केली. पर्वत चढताना आपल्या शरीराची, फुफ्फुसांची, पायांच्या सांध्यांची आणि शारीरिक क्षमतेची जाणीव घेत ते शिखरावरील एका पठारावर पोहोचले. अशा एका शिखरावर, जिथून ३६० अंशांचा विस्तीर्ण देखावा खुला होता. स्वतःकडे ३६० अंशांतून पाहण्याची ही अद्भुत अनुभूती सहभागींची चेतना एका नव्या क्षितिजावर घेऊन गेली. वरून जगाकडे पाहताना आपण नेमके कुठे अडकलो आहोत, हे उमगले. जे आकार इतके विशाल वाटत होते, ते किती लहान आहेत, याची जाणीव झाली. या ३६० अंशांच्या दृश्याने सहभागींना प्रकृतीच्या विविध रंगांशी परिचित करून दिले.
हिरवा, पिवळा, लाल, काळा, निळा, पांढरा... असे अंकुरणारे रंग... संपूर्ण धरतीवर उगवणारे हे रंग तिला रंगभूमीत रूपांतरित करत होते...
या सृजन प्रक्रियेने सहभागींना रंगांच्या अर्थचैतन्याशी जोडले. प्रत्येक रंगाचा एक विचार आहे. प्रत्येक रंगाची एक भूमी आहे. रंगांची भूमी म्हणजे रंगभूमी! रंगभूमीचा मूळ अर्थ आणि ध्येय सहभागींनी प्रकृतीच्या सान्निध्यात आत्मसात केले.
रंगभूमीची ही मूलभूत संकल्पना आत्मसात करत सहभागींनी प्रस्थापित रंगभूमीविषयीची कृत्रिम, सत्ताजन्य समज आणि मान्यता मोडून काढण्यास सुरुवात केली.
रंगभूमी ही सृजनभूमी आहे, जिथे विचारांचे मंथन होऊन विकारांपासून मुक्त होण्याची दृष्टीचेतना सृजित होते. रंगभूमी विचारांच्या विविधतेला जपते.
सहभागींनी प्रकृतीचे रंग आणि सौंदर्यबोध आपल्या कलात्मक रंगप्रस्तुतीच्या माध्यमातून सृजित करून रंगभूमीची मूळ दृष्टी आत्मसात केली.
संकुचितता व्यापकतेत, स्वार्थ स्व-अर्थात, भय विश्वास आणि युक्तीत, परंपरा प्रगतिशीलतेत, प्रगतिशीलता परिवर्तनात, कृत्रिमता नैसर्गिक अनुभूती आणि अभिव्यक्तीत परिवर्तित होत राहिली... विचार अंकुरत राहिले... दृष्टी, कलात्मक स्पंदने कलात्मक आकार धारण करून पुन्हा निराकार होत राहिली...
आत्मअध्ययन अध्यात्माच्या क्षितिजात खोलवर प्रविष्ट होत राहिले, जिथे रंगभूमी सृजित आणि संवर्धित होत राहिली...
वाहणारे झरे, पर्वतांना कवेत घेणारे ढग, ढगांच्या चादरीत लपणारे पर्वत, धरतीवर अंकुरणारे रंग... विविध वनस्पतींचे आकार धारण करत... वाऱ्याच्या प्रखर झोतांनी स्पंदित होणारा प्रवाह रंगकर्मींच्या रंगभूमी सृजन साधनेला ब्रह्मांडाशी जोडत राहिला...
चैतन्य आणि सौंदर्यबोधाच्या अनिवार्य कलात्मक बिंदूंना साधत सर्व सहभागी आपल्या नव्या रंग-आत्मचैतन्याला साधून रंगभूमी सृजन आणि चैतन्याचा संकल्प घेऊन आपल्या गंतव्याकडे परतले!
थियेटर ऑफ रेलेवंस नाट्यदर्शन गेल्या ३४ वर्षांपासून रंगभूमीच्या मूळ अर्थ आणि ध्येयासाठी समर्पित आहे. रंगभूमीच्या मूळ ध्येयाला सत्ता बेरंग करत आली आहे आणि करत राहील... थियेटर ऑफ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत सत्तेच्या षड्यंत्राचा पर्दाफाश करत दशकानुदशके रंगभूमीच्या मूळ अर्थ आणि ध्येयाशी जनमानसाला जोडत राहील!
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थियेटर ऑफ रेलेवंस
रंगभूमी
सृजन आणि संवर्धन (पाच दिवसीय निवासी) कार्यशाळा
८ – १२ जुलै, २०२६, नाशिक
उत्प्रेरक : मंजुल भारद्वाज
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस: रंगभूमि सृजन और संवर्धन कार्यशाला
प्रसंग 2.
जीवन व्यवहार को साधने के लिए मनुष्य की भागदौड़ उसे एक बक्से में बंद कर देती है। मनुष्य भले ही रोज़ शरीर और वस्त्र धो ले पर उसके मन में लोभ,लालच, अपेक्षाओं, सपनों के पूरे ना होने का दंश जमा होता रहता है वो धुलता नहीं अंदर ही अंदर एक बोझ लिए रहता है,कुढ़ता है और विष बनकर पसरने लगता है। नतीजा विचार के ऊपर विकार हावी होने लगते हैं। प्रवाह को जड़ता आ घेरती है और मनुष्य मूढ़ हो अपना शरीर ढोने लगता है....
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस मनुष्य की इस जड़ता को प्राकृतिक प्रक्रियाओं से तोड़ता है। पंचतत्वों से बना मनुष्य शरीर जब अपने तत्वों के प्राकृतिक प्रवाह से जुड़ता है तो अंदर का कचरा बह निकलता है, अंदर पसरी जड़ता स्पंदित अंतर्मन से टूटती है। उमंग,आवेश,आवेग ,स्फूर्ति , आनंद मन के बोझ को बहा देते हैं। अंतर्मन प्रफुल्लित हो अपने भीतर सृजन प्रक्रिया का स्वागत करता है।
अलग अलग रंग यानी विचार अंकुरित होने लगते हैं। जो विकारों से मुक्ति दिलाते हैं। यूं तो यह किसी एक सामान्य पिकनिक नुमा लग सकता है पर यहां यह सारी प्राकृतिक प्रकिया एक दृष्टि बोध के साथ होती है, खपने , थकने और भोग के लिए नहीं .... जैसे रोम रोम जागता है वैसे वैसे सारी ऊर्जा दृष्टि बोध के साथ सृजन प्रक्रिया को उत्प्रेरित करती है...
एक एक पल प्रकृति सम हो एकांतवास में पैठ सृजन साधना में लीन हो जाता है!
हर सहभागी एकांतवास में प्रदीप्त अपनी निराकार सृजन चेतना को दूसरे सहभागी के साथ मिलकर कलात्मक आकार देता है.... अनुभव , अनुभूति से होते हुए कलात्मक सृजन साधना हो जाती है।
सबसे विलक्षण, अनूठा और अद्भुत आयाम होता है जब एक अनुभव अनेक आयामों के साथ प्रस्तुत होता है तब सहभागियों का कलाकार और दर्शक स्तब्ध और रोमांचित होता है... यह प्रक्रिया कार्यशाला में निरंतर चलती है!
सहभागी आकार से निराकार, निराकार से आकार होने की सृजन प्रक्रिया को साधते हुए एक के बाद दूसरे सृजन क्षितिज को साधते रहते हैं.....
- मंजुल भारद्वाज